प्रजापति समाज

राष्ट्रीय प्रजापति समाज एकता संघ

श्री श्रीयादे माता को प्रजापति समाज की कुलदेवी माना जाता है। ये गढ़ मुलतान के सावतोंजी साबलिया की पत्नी थी। कहा जाता है कि श्री श्री यादे माता माँ गौरा पार्वती का अवतार थी तथा इनके पति सावतों जी भगवान शंकर के अवतार थे। इसी कारण आज भी देशभर में माघ सुदी बीज को श्री श्रीयादे माता का जन्मोत्सव (जयंती) बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता है। मध्यप्रदेश सहित कुछ हिस्सों में शीतला सप्तमी के अवसर पर माँ श्री श्रीयादे का स्मरण दिवस भी मनाया जाता है। जन्मोत्सव एवं स्मरण दिवस दोनों ही अवसरों पर श्रीयादे माता की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है तथा हर्षोल्लास के साथ माता की जयंती मनाई जाती है।

श्री श्रीयादे माता का विवाह गढ़ मुलतान(हिरण्यकश्यप की राजधानी) में सावतोंजी साबलिया के साथ हुआ। आपके दो पुत्र एवं एक पुत्री थी। हिरण्यकश्यप ने घोर तपस्या की तथा ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किया कि वह न आकाश में मरे न जमीन पर, न दिन में और न रात में मरे, न मनुष्य से मरे ना ही जानवर से,ना अस्त्र से न शस्त्र से , ना घर में ना घर के बाहर । ब्रह्माजी से यह वरदान पाकर हिरण्यकश्यप स्वयं को अजर अमर समझने लगा था। हिरण्यकश्यप राक्षस जाति में उत्पन्न हुआ था। इस कारण उसकी आसुरी शक्तियाँ जाग गई वह स्वयं को ही भगवान मानने लगा।

हिरण्यकश्यप के राज्य में भगवान शंकर व माता पार्वती ने श्री श्रीयादे माता और उनके पति सावतों जी के रूप में अवतार लिया। दोनों नगर के बाहर रहकर अपना जीवन यापन करते थे। सावतों जी मिट्टी के बर्तन बनाते तथा श्री श्रीयादे माता उनके कार्य में सहायता करती। दोनों भी भगवान विष्णु की भक्ति करते और अपना मिट्टी का कार्य करते। हिरण्यकश्यप के डर से एकान्त में भगवान की पूजा करते और भगवान की मूर्तियाँ भी पानी की मटकी के अंदर रखते थे ।

दोनों पति-पत्नी ने राजाज्ञा की परवाह ना करते हुए,संयम एवं नियम से अपने ईष्ट भगवान की उपासना व भक्ति करते हुए अपना कुम्हारी धंधा करने में करने लगे। हमेशा की तरह एक दिन मिटटी के कच्चे बर्तन पकाने के लिए उन्होनें भटटी (न्यावडा) में लगा दिया और भटटी में अग्नि प्रवेश भी करा दी ।

इतने में कुछ देर बाद बिल्ली चिल्लाती हुई अपने बच्चो को इधर-उधर ढूंढने लगी। बिल्ली की करूणामय आवाज सुनकर व उसकी घबराहट देखकर श्रीयादे माता ने अपनी पति श्री सावतों जी से निवेदन किया कि वह कच्चा कलश घडा कहां है, जिसमें बिल्ली ने बच्चे दिए थे। तब श्री सावतों जी ने कहा कि प्रिये ! वह मटका तो मैनें भूल से भटटी में पकाने हेतु रख दिया और उसमें अग्नि भी प्रज्जवलित कर दी है तथा निमाडे आधे से अधिक बर्तन पकने वाले है।

अपने पति से ऐसे वचन सुनकार दोनों पति पत्नी अत्यंत दुःखी हुए। अग्नि में रखे बिल्ली के बच्चों की प्राण रक्षा के लिए दोनों भगवान विष्णु की उपासना व कीर्तन करने लगे। यह देख प्रहलाद(हिरण्यकश्यप के पुत्र ) व उनके साथियों को बडा आश्चर्य हुआ। राजकुमार प्रहलाद के साथ रहने वाले अंगरक्षकों ने उन्हें डांटते हुए कहा कि तुम राजा की आज्ञा का उल्लंघन कर रहे हो? हमारे राजा के सामने तो देवता व इन्द्र भी सर झुकाते है।

तब श्रीयादे माता ने राजकुमार प्रहलाद को बताया कि हे राजकुमार आपके राजा से कई गुना शक्ति व अन्नत शक्ति के भण्डार भगवान विष्णु है। ऐसी शक्ति आपके स्वामी के पास नहीं है। तब श्रीयादे माता ने भक्त प्रहलाद को अग्नि प्रज्जवलित भटटी में से बिल्ली के बच्चे को जीवन दान देकर भगवान की प्रतिति करवाई।

यह कार्य माता के द्वारा चैत्र मास की शीतला सप्तमी को किया गया इसी दिन प्रहलाद ब्रहम ज्ञान की प्राप्ति हुई एवं वे ईश्वर भक्ति में लगे। उन्होनें राजकुमार प्रहलाद को बताया कि आज भूलवश वह मटका न्यावडा में रखा गया है जिसमें बिल्ली के बच्चे थे। अब उस प्रचड अग्नि से उन्हें बचाने के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना कर रहे है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि उस दहकती अग्नि से भगवान बिल्ली को सकुशल बाहर निकाल लेंगे।

यह बात सुनकार प्रहलाद एवं उनके साथ्यिों को बहुत आश्चर्य हुआ व उन्हें देखने के लिए प्रहलाद व उनके साथी वही रूक गये फिर भी श्रीयादे माता व उनके पति पुनः हरिस्मरण करते हुए, बर्तन की भटटी खोलना प्रारम्भ कर दिया। भटटी में से बर्तनों को निकालते हुए उस बिल्ली के बच्चे वाले मटके की बारी आई तो राजकुमार ने देखा कि मटका बिल्कुल कच्चा है और उसमें से बिल्ली के बच्चे हर्षोन्मत होकर बाहर निकले। उस प्रचड अग्नि में से बिल्ली के बच्चों को जीवित निकलता देखकर प्रहलाद ने श्रीयादे माता से नवधा भक्ति व हरि कीर्तन का पाठ पढकर राजमहल को गए व भक्त प्रहलाद हो गये एवं हरिकीर्तन करने लगे।

इस कथा में भक्त श्रीयादे माता प्रजापति भक्त प्रहलाद की आध्यात्मिक गुरू एवं भक्ति की प्रेरणा स्त्रोत के रूप में वर्णित है। उसके बाद श्रीयादे माता व सावतोंजी ने अर्थात उमा महेश नृसिहं भगवान के दर्शन किए व अपने मूल रूप में कुम्भकार को दर्शन देकर जल (सूर्यकुण्ड) में प्रविष्ठ हो शिव धाम लौट गए।

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