प्रजापति समाज

राष्ट्रीय प्रजापति समाज एकता संघ

प्रजापति समाज का इतिहास

प्रजापति समाज जो पूर्व में कुम्हार, कुंभकार आदि नामों से जानी जाती थी का इतिहास बहुत गौरवशाली रहा है। कुम्हार शब्द का जन्म संस्कृत भाषा के ‘कुम्भकार’ शब्द से हुआ है | जिसका अर्थ है -मिट्टी का बर्तन बाने वाला | यह समाज की महत्वपूर्ण सेवा करता है तथा परिवार के उपयोग में आने वाले सभी प्रकार के बर्तनों का निर्माण करता है | कहा जाता है कि कला का जन्म कुम्हार के घर से ही हुआ है। मानव सभ्यता के विकास में कुम्हार का योगदान महत्वपूर्ण है। सभ्यता के आरम्भ में दैनिक उपयोग की सभी प्रकार की वस्तुओं का निर्माण कुम्हार के द्वारा किया जाता है। कुम्हार ग्राम के सेवकों में गिने जाते हैं | कुम्हार काफी प्राचीन है, क्योंकि द्रोपदी सहित पांचो पाण्डव वनवास के समय पाँचाल देश के द्रुपद राजा के राजधानी के प्रजापति के घर में ठहरे थे |

कुम्हार की उत्पत्ति

वैदिक साहित्य के अनुसार कुम्हार की उत्पत्ति त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) के द्वारा हुई। कहा जाता है महादेव जी के विवाह में मंगल कलश(कुम्भ) की जरूरत हुई तो महादेव जी ने अपनी जटा के बाल व पार्वती के मैल से एक पुतला बनाया, उस पर जल छिड़का तो उसने मनुष्य रूप धारण कर लिया | उसका नाम जलधरा रखा और उससे कलश बनाने को कहा, जिसके लिए विष्णु जी ने अपने चक्र का चाक, ब्रह्मा जी ने कमंडल की कुड़ी और घोटे का हत्था चाक फेरने का, बनाकर दिया और जब उसने कुम्भ को चाक पर उतारा व धूनी के न्याव में पकाकर ब्रह्माजी को भेजा और ब्रह्माजी ने जलधरा को अपने पास बिठाया | जैसे जैसे लोग देखने आये, जलधरा पीछे हटता गया | इससे ब्रह्माजी ने कहा कि “दूर ही रहना और गाँव होड़े घड़ना |” इसी जलधरा से कुम्हार जाति बनी।

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